विवाद में फंसी इतिहास की किताब,यूनिवर्सिटी ने किया किनारा, रावत ने दी सफाई

विवाद में फंसी इतिहास की किताब,यूनिवर्सिटी ने किया किनारा, रावत ने दी सफाई

हल्द्वानी थारू और बुक्सा जनजाति के इतिहास को लेकर टकराव खड़ा हो गया है इतिहास की एक पुस्तक से टकराव बढ़ रहा है, जिसे लिखा है कुमाऊं यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर और प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो अजय सिंह रावत ने रावत की पुस्तक का नाम ‘उत्तराखंड का समग्र सियासी इतिहास’ है इस पुस्तक के एक पन्ने पर तराई के आदिवासी थारू नाम से एक शीर्षक है, जिसमें उन्होंने इतिहासकार एचआर नेविल के कथन का जिक्र किया है रावत के इन शब्दों पर इन जनजातियों के प्रतिनिधियों ने विरोध दर्ज करवाते हुए एफआईआर तक करवा दी है उनका आरोप है कि तथ्य तोड़ मरोड़कर पेश किए गए हैं

रावत की पुस्तक में लिखा है कि तराई अंचल में प्रचलित धारणा के मुताबिक तेरहवीं-चौदहवीं सदी में राजस्थान में आक्रमणकारियों ने धावे बोले उनके सामने राजपूतों की हार हुई रानियों ने आतताईयों के चंगुल में फंस जाने के बजाय अपने विश्वस्त सेवकों के साथ वहां से भाग जाने में ही भला देखा तराई के सघन वनों में उन्हें शरण मिल गई अपने अनुचरों से पैदा उनकी संतान ही ये आदिवासी हैं रावत ने इतिहासकार नेविल को कोट करते हुए लिखा है कि ‘रानियों के साथ भागकर आए चमार सेवकों की संतान थारू हैं और लुहारों को संतान बुक्सा

क्या है इन जनजातियों का दावा?

रावत ने नेविल की जिस बात का जिक्र पुस्तक में किया है, टकराव इन्हीं पंक्तियों से जुड़ा है क्योंकि थारुओं में मान्यता है कि वो राजस्थान के सिसौदिया राजपूतों के वंशज हैं और जयमल सिंह, फतेह सिंह और तारण सिंह उनके पूर्वज थे जबकि तराई के गदरपुर, बाजपुर, काशीपुर और रामनगर में रहने वाले बुक्सा जनजाति के लोग मानते हैं कि वो राजस्थान के किसी राजपूत राजा के वंशज हैं

थारू समाज से जुड़े श्याम सिंह के अनुसार रावत ने समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है और इन जातियों के इतिहास को तोड़मरोड़कर पेश किया है इन आरापेां के साथ थारू परिषद के अध्यक्ष दान सिंह राणा ने रावत के विरूद्ध एससी-एसटी एक्ट के अनुसार खटीमा थाने में केस दर्ज कराया है

यूनिवर्सिटी ने किया किनारा, रावत ने दी सफाई

गौरतलब है कि विवादित अंश वाली यही पुस्तक वर्ष 2011 से पहले उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी में इतिहास के सिलेबस का हिस्सा हुआ करती थी इसकी स्थान यूनिवर्सिटी पिछले 11 वर्षों से नया सिलेबस पढ़ा रही है उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी में विद्यालय ऑफ सोशल साइन्स के डायरेक्टर प्रोफेसर गिरिजा प्रसाद पांडे के अनुसार रावत की लिखी न तो कोई पुस्तक यूनिवर्सिटी के सिलेबस में शामिल है और न ही रावत यूनिवर्सिटी की सिलेबस कमेटी में हैं

रावत ने भी पूरे मुद्दे में सफाई दी है मीडिया से बात करते हुए उनहोंने बोला कि उनका मकसद किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं क्योंकि आप जब इतिहास लिखते हैं तो पुराने इतिहासकारों की पुस्तकों का शोध करते ही हैं “मैंने नेविल का ही, जिक्र किया है, इसमें मेरी टिप्पणी शामिल नहीं है इसके बावजूद रावत ने बोला ‘मैंने अपनी पुस्तक से विवादित अंश हटा दिए हैं, जिससे किसी की भावना को ठेस न पहुंचे एफआईआर पर रावत ने बोला कि यह जानकारी उन्हें मीडिया से मिली ओर इसके पहले ही वह विवादित अंश हटा चुके