गोरखपुर यूनिवर्सिटी के पांच विद्यार्थियों ने उड़ती चिडिया का लिया सैंपल

गोरखपुर यूनिवर्सिटी के पांच विद्यार्थियों ने उड़ती चिडिया का लिया सैंपल

मुहावरा है उड़ती चिडिया के पंख गिनना. कभी सोचा है कि अगर वास्तव में ऐसा करना हो तो कितनी मशक्कत झेलनी पड़ेगी. गोरखपुर यूनिवर्सिटी के पांच विद्यार्थियों ने न केवल उनके पंख बल्कि उनके सारे हाव भाव मसलन आंखों का रंग, लडने के तरीके, अंग, आकार, चोंच व उनकी आवाज को सुनकर यूनिवर्सिटी कैंपस में आने वाले 45 पक्षियों को चिन्हित करने में सफलता हासिल की है.  


जुलोजी विभाग के एमएससी (पर्यावरण विज्ञान) द्वितीय साल की रिचा सिंह, अवंतिका जायसवाल, जान्हवी सिंह, निधि सिंह व शैलेंद्र कुमार भास्कर को पक्षियों की विविधता पर यूं तो प्रोजेक्ट के तौर पर ये कार्य मिला था. जोश व उत्साह से लबरेज इन युवाओं ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए पांच महीनों के अथक कोशिश के बाद यह उपलब्धि हासिल की है.
उन्होंने बताया कि इस प्रोजेक्ट पर (सितंबर 2017 - फरवरी 2018) के बीच कार्य किया.  इसके तहत कैंपस में हरियाली की प्रचुर मात्रा व भोजन की उपलब्धता को लेकर कैंपस में कुछ स्थानों को चिन्हित किया. इनमें बॉटनिकल गार्डेन, कला संकाय, विधि विभाग, बीएससी गृहविज्ञान समेत विधि विभाग के पास पक्षियों की अच्छी तादात नजर आई.

पक्षियों की कुछ जरूरी देसी प्रजातियां

इसके  बाद योजना को जमीन पर उतारने की प्रयास प्रारम्भ हुई. इसके मुताबिक टीम के हर मेम्बर की एक अहम किरदार उपस्थित थी. कोई चारा डालकर पक्षियों को जमीन पर आने को विवश करता था. कुछ मेम्बर पक्षियों को दूरबीन की सहायता से देखते थे.

एक मेम्बर पक्षियों की पहचान के लिए बने नियमों के मुताबिक आंखों, लडने के तरीके, अंग, आकार पर दूरबीन से देखने वाले मेम्बर से जानकारी मांगता था. एक मेम्बर रजिस्टर पर मिली पहचान के आगे ठीक व गलत का निशान लगाता था. हर दिन हर मेम्बर की किरदार में परिवर्तन होता था, ताकि दूसरों को भी बराबर मौका मिले.
 
कोतवाल, मूटरी, सेवन सिस्टर्स, कबूतर, खंजन, मैना, बुलबुल, पीलक, नील कंठ, फाक्टा, कठफोड़वा, कोयल, टिटिहरी, हुदहुद, धानेश, शिकरा, पपीहा समेत पूर्वांचल में पाई जाने वाली 45 प्रजातियों के पक्षी शामिल हैं.

गुलाबी मैना या गुलाबी सारिका स्टर्निडी परिवार का एक पक्षी है. इसमें मैना भी शामिल है. इनके अन्य नाम तिल्यर या तेलियर व कन्नड़ भाषा में इसके मधुर गीत के कारण इसे मधुसारिका भी कहते हैं. यह एक प्रवासी पक्षी है, जो अपने प्रवास के दौरान छह से आठ माह तक हिंदुस्तान में रहते हैं. ये पक्षी मुख्यत: मैदानी क्षेत्रों में रहते हैं. ये कजाकिस्तान समेत रूस में पाए जाते हैं.
 
महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी भी बना मेहमान
यूनिवर्सिटी कैंपस में मिले पक्षियों की जमात में महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी हरियल भी शामिल हैं. इसे पीले पैरों वाले हरे कबूतर के नाम से भी जाना जाता है. यह ट्रेरन फॉनीकॉप्टेरा की प्रजाति का है.
 
हर दिन किया छह घंटों तक काम
युवाओं ने बताया कि जगह का चयन किए जाने के बाद एक समय सारिणी बनाई गई. दिन में उनकी ज्यादा हलचल ज्यादातर प्रातः काल भोजन की तलाश व शाम को घर वापसी के दौरान होती है. इसे ध्यान में रखकर तीन-तीन घंटे प्रातः काल 7-10 बजे व दोपहर से 2-5बजे की समय सारिणी बनाई गई. छह घंटो के बाद कभी पक्षी को पहचानने में सफलता मिल जाती थी, नहीं तो कई दिन निराश होकर भी घर लौटना पड़ता था.

युवाओं ने बताया कि 2013 की एवीआई बर्ड काउंट रिपोर्ट के मुताबिक गोरखपुर इलाके के 5484 किलोमीटर के भूभाग में करीब 345 प्रजातियों के पक्षी उपस्थित हैं. इसमें अकेले 1.214 किलोमीटर भूभाग में फैले यूनिवर्सिटी में 12.5 फीसदी पक्षी उपस्थित हैं. इनमें लोकल पक्षियों के साथ ही अतिथि परिंदे भी शामिल हैं.  
 
इनका मिला मार्गदर्शन
प्रोजेक्ट को पूरा करने में गोरखपुर यूनिवर्सिटी के जुलोजी विभाग के शिक्षक प्रो। डीके सिंह, डाक्टर विनय कुमार सिंह, डाक्टर विनीत कुमार समेत कंचनजंगा वन्य अभ्यारण्य के पूर्व प्रधान वार्डेन प्रतीक चंदन को पूरा मार्गदर्शन मिला. समय समय इन अनुभवी शिक्षकों की टीम ने उन्हें प्रोत्साहित किया.