बिहार : असहायों व गरीबों के लिए चल रही सामुदायिक रसोई, रोजाना इतने लोग पा रहे भोजन

बिहार : असहायों व गरीबों के लिए चल रही सामुदायिक रसोई,  रोजाना इतने लोग पा रहे भोजन

महात्मा बुद्ध की ज्ञानस्थली यूं तो बिहार का बोधगया है, लेकिन उनके संदेश देश-विदेश तक फैले हैं। आज उन्हीं के संदेश को लिए बिहार के भोजपुर जिले के एक छोटे से गांव में 'बुद्धं शरणं गच्छामि' मूलमंत्र को आत्मसात किए एक संस्था असहायों व गरीबों के लिए सामुदायिक रसोई चला रही है। इस रसोई में रोजाना 600 से 800 लोग भोजन पा रहे हैं।

आरा-बक्सर सड़क के किनारे बसे कारीसाथ गांव में 80 के दशक से ही संचालित आश्रम में रोजाना सामुदायिक रसोई चल रही है। इस रसोई के लिए ना तो किसी प्रकार की सरकारी सहायता मिली है व ना ही किसी संस्था ने इसके लिए राशि दान की है। इसलिए सामुदायिक रसोई चलाने के लिए पैसा भिक्षाटन से जुटाया जा रहा है।

बुद्धं शरणं संस्थान ट्रस्ट के सचिव अरुण कुमार सिंह ने कहा, "भगवान बुद्ध के संदेश दुनिया शांति व कल्याण के साथ दूसरों की सहायता करने की सीख देते हैं। आज इस कोरोना के दौर में जब लोगों के सामने खाने तक की समस्या उत्पन्न हो गई है, तब उन्हीं के संदेशों से प्रेरणा लेकर लोगों की सेवा की जा रही है। "

उन्होंने बोला कि लॉकडाउन लागू होने पर प्रारम्भ की गई इस सामुदायिक रसोई में रोजाना कारीसाथ, गजराजगंज, नवानगर, धमार, भेड़िया, अमरपुर, मरवटिया आदि गांव के गरीब व निर्बल लोग पहुंचते हैं व भरपेट भोजन करते हैं।

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर समाजसेवा का उद्देश्य के साथ बुद्ध के संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने को आतुर सिंह ने आईएएनएस से कहा, "कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए किए गए तरीकों से सभी लोग परेशान हैं, सबसे अधिक कठिनाई गरीबों व निर्बल लोगों को हो रही है। यह तरीका आवश्यकता है, लकिन गरीबों के समक्ष अपने व अपने परिवार की भूख मिटाने की बड़ी समस्या आ गई। संस्थान ने समस्या के निवारण के लिए एक कोशिश प्रारम्भ किया है। सामुदायिक रसोई प्रतिदिन दोपहर 12 बजे से लेकर शाम पांच बजे तक चलती है। "

उन्होंने आगे कहा, "किसी दिन खिचड़ी तो िकसी दिन चावल, दाल व सब्जी का प्रसाद परोसा जा रहा है। यहां सभी प्रकार के भेदभाव को भूलकर लोग जुटते हैं व प्रसाद पाते (खाना-खाते) हैं, जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ख्याल रखा जाता है। " उन्होंने बोला कि जब तक लॉकडाउन रहेगा, तब तक रसोई बंद नहीं की जाएगी।

सिंह ने कहा, "शुरुआत में सामुदायिक रसोई बनाने में कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन अब गांव के लोग भी इसमें योगदान कर रहे हैं। अरुण कहते हैं, "भगवान बुद्ध ने त्याग व शांति का ही संदेश दिया है। पूरा देश आज मुश्किल दौर से गुजर रहा है, अगर आज हम थोड़े-थोड़े त्याग कर सकें तो ना केवल देश की सेवा हो सकेगी, बल्कि गुरु की भी सेवा हो जाएगी। "

इधर, गरीब व निर्बल भी आश्रम में प्रसाद पाकर खुश हैं। नावानगर के एक 13 वर्षीय बच्चे आनंद से जब इस रसोई को लेकर आईएएनएस ने बात की, तब उसका दर्द खुलकर सामने आ गया। आनंद रोजाना यहां आकर प्रसाद पाता है। उसने कहा, "घर में भोजन तो मिलता है, लेकिन उससे पेट नहीं भरता। यहां भरपेट खाना मिल जाता है। "  उल्लेखनीय है कि आश्रम द्वारा समय-समय पर लोगों के कल्याणार्थ कई अन्य तरह के भी सामाजिक काम भी कराए जाते रहे हैं।