मुस्लिम लड़की कब होती है बालिग? इस पर सुनवाई करेगा उच्चतम न्यायालय

मुस्लिम लड़की कब होती है बालिग? इस पर सुनवाई करेगा उच्चतम न्यायालय

सुप्रीम न्यायालय उस याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गया है जिसमें एक नाबालिग मुस्लिम विवाहित लड़की को यूपी के आश्रय गृह में रहने को कहने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई है.

उच्च न्यायालय ने इस लड़की के शादी को शून्य घोषित कर दिया है. न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति इन्दिरा बनर्जी व न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ उच्च न्यायालय के जुलाई के आदेश के विरूद्ध इस लड़की की अपील पर सुनवाई कर रही थी. पीठ ने लड़की की दलीलों को सुनने के बाद इस पर विचार के लिए सहमति जाहीर करते हुए यूपी सरकार को नोटिस जारी किया है.

मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार यह लड़की 16 वर्ष की है व उसने अयोध्या की निचली न्यायालय द्वारा उसे आश्रय गृह भेजने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका उच्च न्यायालय में खारिज होने के बाद यह अपील दायर की है. उच्च न्यायालय ने इस लड़की की याचिका खारिज करते हुए टिप्पणी की थी कि चूंकि वह ‘नाबालिग’ है, इसलिए उसके मुद्दे की सुनवाई किशोर न्याय (देखभाल एवं संरक्षण) कानून, 2015 के अनुसार की जाएगी. उच्च न्यायालय ने यह भी बोला था कि चूंकि वह अपने माता-पिता के साथ नहीं रहना चाहती है, इसलिए उसे आश्रय गृह भेजने का निचली न्यायालय का आदेश ठीक है.

इस लड़की ने अपनी याचिका में बोला है कि मुस्लिम कानून के तहत लड़की के रजस्वला की आयु , जो 15 साल है, के होने पर वह अपनी जिंदगी के बारे में फैसला लेने के लिए स्वतंत्र है व अपनी पसंद के किसी भी आदमी से विवाह करने में सक्षम है. इस लड़की ने अपने एडवोकेट दुष्यंत पाराशर के माध्यम से दायर याचिका में बोला है कि उच्च न्यायालय इस तथ्य की सराहना करने में विफल रहा कि उसका निकाह मुस्लिम कानून के अनुसार हुआ है.

याचिका में लड़की ने अपने जीने व स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करने का अनुरोध करते हुए दलील दी है कि वह एक युवक से प्रेम करती है व इस वर्ष जून में मुस्लिम कानून के अनुसार उनका निकाह हो चुका है. लड़की के पिता ने पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत में एक युवक व उसके सहयोगियों ने उसकी बेटी का किडनैपिंग कर लिया है.

इसके बाद, इस लड़की ने मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराए गए अपने बयान में बोला है कि उसने एक युवक से अपनी मर्जी से विवाह की है व वह उसके ही साथ रहना चाहती है. निचली न्यायालय ने लड़की को आश्रय गृह भेजने का आदेश देते हुये बोला था कि उसे 18 बरस की होने तक वहीं रखा जाए. इस लड़की ने शीर्ष न्यायालय के निर्णय का हवाला देए हुए बोला है कि उसे अपने पति के साथ ही वैवाहिक जिंदगी गुजारने की अनुमति दी जाए. याचिका में बोला गया है कि इस लड़की को उच्चतम न्यायालय में अपील लंबित होने के दौरान आश्रय गृह से मुक्त किया जाए.