जानें, कोविड-19 के चलते किन राष्ट्रों ने रोकीं हिंदुस्तान से उड़ानें

जानें, कोविड-19 के चलते किन राष्ट्रों ने रोकीं हिंदुस्तान से उड़ानें

भारत में कोविड-19 वायरस की दूसरी वेव के चलते दूसरे देश भी अलर्ट हो गए हैं. हिंदुस्तान में पॉजिटिव मामलों में तेजी से वृद्धि हो रहा है और नए वेरियंट से इन्फेक्शन का खतरा भी बढ़ा है. ऐसे में हिंदुस्तान के साथ फ्लाइट्स पर इसका प्रभाव देखने को मिला है. पिछले वर्ष मार्च में अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें रद्द करने के बाद विशेष समझौतों के अनुसार ट्रैवलिंग में ढील दी गई थी लेकिन अब एक बार फिर फ्लाइट्स बंद करने की नौबत आ गई है. कई राष्ट्रों ने हिंदुस्तान से आने वाली उड़ानों को रोक दिया है. एक नजर डालते हैं दूसरे राष्ट्रों के साथ उड़ानों को लेकर मौजूदा स्थिति पर-


हॉन्ग-कॉन्ग
भारत ने हॉन्ग-कॉन्ग से हिंदुस्तानियों को वापस लाने के लिए ' वंदे भारत ' मिशन के अनुसार उड़ानें चलाई थीं लेकिन वैसे 3 मई तक सभी फ्लाइट्स को सस्पेंड कर दिया गया है. इसी महीने विस्तारा की दो फ्लाइट्स से पहुंचने के बाद 50 हिंदुस्तानियों के पॉजिटिव पाए जाने के बाद यह निर्णय किया गया.

ब्रिटेन
पहले ब्रिटेन में फैल रहे कोविड-19 वायररस वेरियंट की वजह से हिंदुस्तान ने ब्रिटेन से आने वाली उड़ानों पर रोक लगाई और अब ब्रिटेन ने हिंदुस्तान में फैल रहे वेरियंट की वजह से यहां से जाने वाली फ्लाइट्स को रोक दिया है. यहां से पहुंचे 7 भारतीय म्यूटेंट स्ट्रेन के लिए पॉजिटिव मिले थे. ब्रिटेन ने हिंदुस्तान को रेड लिस्ट पर रखा है और एयर इंडिया ने ब्रिटेन से आने-जाने वाली फ्लाइट्स को 30 अप्रैल तक रोक दिया है.


दुबई
भारतीयों, या दूसरे देश के ऐसे नागरिक जिन्होंने 14 दिन के अंदर हिंदुस्तान की यात्रा की हो, उन्हें दुबई में एंट्री नहीं है. एमिरेट्स ने हिंदुस्तान से दुबई जाने वाली फ्लाइट्स रोक दी हैं. वहां से आने वाली फ्लाइट्स को अभी इजाजत है और UAE के नागरिकों, डिप्लोमैटिक पासपोर्ट होल्डर और आधिकारिक प्रतिनिधिमंडलों पर यह नियम लागू नहीं है.


कनाडा
भारत और पाक से 30 दिन के लिए सभी फ्लाइट्स पर बैन लगा दिया गया है. कार्गो उड़ानों की इजाजत है.


पाकिस्तान

पाकिस्तान ने दो सप्ताह के लिए हिंदुस्तान से ट्रैवल पर रोक लगाई है.


न्यूजीलैंड
न्यूजीलैंड ने 11 अप्रैल से लेकर 28 अप्रैल तक के लिए हिंदुस्तान से जाने वाली फ्लाइट्स पर बैन लगा रखा है.


अमेरिका
अमेरिका ने अपने देश से हिंदुस्तान आने वाले लोगों के लिए अडवाइजरी जारी की है. केवल बहुत महत्वपूर्ण होने पर हिंदुस्तान जाने, पहले वैक्सिनेशन पूरा कराने, सोशल डिस्टेंसिंग जैसे नियमों का पालन करने के लिए बोला गया है.

इजरायल ने गुरुवार को अडवाइजरी जारी कर लोगों से हिंदुस्तान आने से बचने को बोला है. यहां वैक्सिनेट हो चुके लोगों को भी यह सलाह दी गई है. हिंदुस्तान के अतिरिक्त यूक्रेन, इथियोपिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, मेक्सिको और तुर्की भी नहीं जाने की सलाह दी गई है.

सिंगापुर
सिंगापुर ने मंगलवार से हिंदुस्तान आने को लेकर नए नियम जारी किए हैं. हिंदुस्तान से जाने वाले लोगों को पहले 14 दिन के लिए स्पेशल फसिलटी और फिर 7 दिन के लिए घर पर आइसोलेट होना होगा.

पिछले वर्ष अंतर्राष्ट्रीय ट्रैवल पर प्रभाव के बाद हिंदुस्तान और इन 27 राष्ट्रों के बाच ट्रैवल अग्रीमेंट हुआ है- अफगानिस्तान, बाहरेन, बांग्लादेश, भूटान, कनाडा, इथियोपिया, फ्रांस, जर्मनी, इराक, जापान, केन्या, कुवैत, मालदीव, नेपाल, नीदरलैंड्स, नाइजीरिया, ओमान, कतर, रूस, रवांडा, सेशेल्स, तंजानिया, यूक्रेन, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका और उज्बेकिस्तान.


धरती पर हैं चार नहीं, पांच महासागर? अंटार्कटिका के पास है कुछ सबसे अनोखा

धरती पर हैं चार नहीं, पांच महासागर? अंटार्कटिका के पास है कुछ सबसे अनोखा

हमारी धरती का 75 परसेंट भाग पानी में डूबा हुआ है. सात महाद्वीपों के साथ चार महासागर जीवन का आधार हैं. हालांकि, नैशनल जियोग्राफिक के अनुसार महासागर चार नहीं बल्कि पांच हैं. इसके अनुसार अंटार्कटिका के पास दक्षिणी महासागर भी अपने आप में एक अलग महासागर है और उसे आर्कटिक, अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागर के साथ स्थान मिलनी चाहिए. नैशनल जियोग्राफिक सोसायटी जियोग्राफर अलेक्स टेट के अनुसार वैज्ञानिक तो अंटार्कटिक दक्षिणी महासागर को अलग मानते रहे हैं लेकिन कभी अंतर्राष्ट्रीय सहमति नहीं बन पाई जबकि दुनिया का यह भाग बहुत खास है. (UK Ministry of Defence/REUTERS)

Southern Ocean of Antarctica: अंटार्कटिका के पास पानी का करंट इतना अलग है कि National Geographic ने इसे अलग महासागर मान लिया है.



हमारी धरती का 75 परसेंट भाग पानी में डूबा हुआ है. सात महाद्वीपों के साथ चार महासागर जीवन का आधार हैं. हालांकि, नैशनल जियोग्राफिक के अनुसार महासागर चार नहीं बल्कि पांच हैं. इसके अनुसार अंटार्कटिका के पास दक्षिणी महासागर भी अपने आप में एक अलग महासागर है और उसे आर्कटिक, अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागर के साथ स्थान मिलनी चाहिए. नैशनल जियोग्राफिक सोसायटी जियोग्राफर अलेक्स टेट के अनुसार वैज्ञानिक तो अंटार्कटिक दक्षिणी महासागर को अलग मानते रहे हैं लेकिन कभी अंतर्राष्ट्रीय सहमति नहीं बन पाई जबकि दुनिया का यह भाग बहुत खास है. (UK Ministry of Defence/REUTERS)



अब तक कहां छिपा था?

नैशनल जियोग्राफिक के अनुसार यह महासागर अंटार्कटिका के तट से 60 डिग्री दक्षिण की ओर है और दूसरे राष्ट्रों से किसी महाद्वीप नहीं बल्कि अपने करंट की वजह से अलग होता है. इसके अंदर आने वाले क्षेत्र अमेरिका से दोगुना है. सोसायटी आमतौर पर इंटरनैशनल हाइड्रोग्राफिक ऑर्गनाइजेशन के नामों को मानती है जिसने 1937 की गाइडलाइन्स में दक्षिणी महासागर को अलग माना था लेकिन 1953 में इसे बाहर कर दिया. इसके बावजूद अमेरिका के जियोग्राफिक नेम्स बोर्ड ने 1999 से दक्षिणी महासागर नाम का इस्तेमाल किया है. फरवरी में National Oceanic and Atmospheric Administration ने इसे मान लिया. (फोटो: British Antarctic Survey Reuters)



खतरों से घिरा

यह कदम कई अर्थ में खास है. नैशनल जियोग्राफिक एक्सप्लोरर एनरिक साला ने बताया है कि दक्षिणी महासगर में बहुत अनोखे और गम्भीर जलीय ईकोसिस्टम पाए जाते हैं जहां वेल, पेंग्विन्स और सील्स जैसे जीव रहते हैं. ऐसी हजारों प्रजातियां हैं जो केवल यहीं रहती हैं, और कहीं नहीं पाई जातीं. इस क्षेत्र में मछली पकड़ने की गतिविधियों का बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा है. ऐसे में संरक्षण की आवश्यकता के चलते भी इसे अलग से मान्यता देना अहम हो जाता है. इसके अतिरिक्त जलवायु बदलाव का प्रभाव भी पड़ रहा है. पिछले महीने दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड अंटार्कटिका से अलग हो गया. फरवरी में भी एक विशाल हिमखंड टूट गया था. (Reuters)



कब बना था?

एक खास अंटार्कटिक सर्कमपोलर करंट भारी मात्रा में पानी ट्रांसपोर्ट करता है और पूरे विश्व में ऐसे सर्कुलेशन सिस्टम को चलाता है जो धरती पर गर्मी ट्रांसपोर्ट करता है. नैशनल जियोग्राफिक 1915 से मैप तैयार कर रहा है और इसके करंट के आधार पर कार्टोग्राफर्स ने यह निर्णय किया है. वर्ल्ड वाइड फंड के अनुसार यह महासागर सबसे हाल में बना महासागर हुआ. यह 3 करोड़ वर्ष पहले बना था जब अंटार्कटिका और दक्षिण अमेरिका एक-दूसर से अलग हुए थे. टेट का बोलना है कि इस महासागर के बारे में लोगों को अलग से बताया-पढ़ाया नहीं गया तो इसकी जरूरतों, सम्मान और खतरों को समझा नहीं जा सकेगा.