बाइडेन अपने खास सहयोगी को बना सकते हैं हिंदुस्तान में अमेरिकी राजदूत, जानें

बाइडेन अपने खास सहयोगी को बना सकते हैं हिंदुस्तान में अमेरिकी राजदूत, जानें

चीन साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्‍ट्रपति जो बाइडेन हिंदुस्तान के साथ रिश्‍ते मजबूत करने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ते नजर आ रहे हैं. बाइडेन जल्‍द ही अपने सियासी सहयोगी और लॉस एंजिलिस के मेयर एरिक गार्सेट्टी को हिंदुस्तान में राजदूत बनाने का ऐलान कर सकते हैं. हिंदुस्तान में राजदूत पद के लिए एरिक गार्सेट्टी का नाम अमेरिकी मीडिया चर्चा का विषय बना हुआ है. आइए जानते हैं, कौन हैं एरिक गार्सेट्टी।

वाइट हाउस ने ऐलान किया है कि राष्ट्रपति जो बाइडन राजदूत संबंधी कई पदों के लिए जल्द ही औपचारिक घोषणाएं कर सकते हैं. वाइट हाउस की प्रेस सचिव जेन साकी ने कहा, ‘मैं यहां से कोई निजी घोषणा नहीं कर सकती लेकिन आशा है कि हम जल्द ही राजूदतों पर और औपचारिक घोषणाएं करेंगे.’ साकी मीडिया में आई एक समाचार पर उत्तर दे रही थीं जिसमें बोला जा रहा है कि लॉस एंजिलिस के मेयर एरिक गार्सेट्टी हिंदुस्तान में अगले राजदूत हो सकते हैं.

2013 से ही लॉस एंजिलिस के मेयर
भारत में अमेरिकी राजदूत का पद 20 जनवरी से खाली है. पूर्णकालिक राजदूत की अनुपस्थिति में विदेश सेवा संस्थान के निदेशक डेनियल स्मिथ को अंतरिम कार्यभार संभालने के लिए हिंदुस्तान भेजा गया. अब इनकी स्थान पर एरिक गार्सेटी के हिंदुस्तान का राजदूत बनने की चर्चा जोरों पर है. 50 वर्ष के एरिक गार्सेटी साल 2013 से ही लॉस एंजिलिस के मेयर हैं. वह लॉस एंजिल‍िस के सिटी काउंसिल के अध्‍यक्ष रह चुके हैं.

इससे पहले ऐसी चर्चा थी कि गार्सेटी को ओबामा प्रशासन में परिवहन मंत्री बनाया जा सकता है लेकिन उनकी स्थान पर पेटे बुटिगिग को यह पदभार दिया गया. कोविड-19 वायरस से जूझने के बाद अब लॉस एंजिलिस में फिर से बिजनस खुल रहे हैं. इससे पहले गार्सेटी ने बोला था कि वह बाइडेन प्रशासन में शामिल होने की बजाय लॉस एंज‍िलिस में महामारी को खत्‍म करने का कोशिश करेंगे.


गार्सेटी के अनुभवों से हिंदुस्तान को भी मिल सकता है फायदा
जनवरी 2020 में गार्सेटी ने बाइडेन को राष्‍ट्रपति पद का प्रत्‍याशी बनाए जाने का समर्थन किया था. गार्सेटी ने बाइडेन की कम‍िटी के सह अध्‍यक्ष थे. यदि गार्सेटी के हिंदुस्तान के राजदूत के रूप में नाम का ऐलान होता है तो सीनेट से इसकी स्वीकृति लेना आवश्‍यक होगा. गार्सेटी के नाम की चर्चा ऐसे समय पर हो रही है जब हिंदुस्तान कोविड-19 वायरस के कहर से जूझ रहा है. कोविड-19 वायरस की दूसरी लहर से हिंदुस्तान में प्रत्येक दिन लाखों मुद्दे आ रहे हैं और बड़ी संख्‍या में लोगों की मौतें हो रही हैं. कोविड-19 महामारी से निपटने के गार्सेटी के अनुभवों से हिंदुस्तान को भी फायदा मिल सकता है. साथ ही बाइडेन अपने सहयोगी को नियुक्‍त चाइना को कड़ा संदेश सकते हैं जो लद्दाख में आंखें द‍िखा रहा है.


धरती पर हैं चार नहीं, पांच महासागर? अंटार्कटिका के पास है कुछ सबसे अनोखा

धरती पर हैं चार नहीं, पांच महासागर? अंटार्कटिका के पास है कुछ सबसे अनोखा

हमारी धरती का 75 परसेंट भाग पानी में डूबा हुआ है. सात महाद्वीपों के साथ चार महासागर जीवन का आधार हैं. हालांकि, नैशनल जियोग्राफिक के अनुसार महासागर चार नहीं बल्कि पांच हैं. इसके अनुसार अंटार्कटिका के पास दक्षिणी महासागर भी अपने आप में एक अलग महासागर है और उसे आर्कटिक, अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागर के साथ स्थान मिलनी चाहिए. नैशनल जियोग्राफिक सोसायटी जियोग्राफर अलेक्स टेट के अनुसार वैज्ञानिक तो अंटार्कटिक दक्षिणी महासागर को अलग मानते रहे हैं लेकिन कभी अंतर्राष्ट्रीय सहमति नहीं बन पाई जबकि दुनिया का यह भाग बहुत खास है. (UK Ministry of Defence/REUTERS)

Southern Ocean of Antarctica: अंटार्कटिका के पास पानी का करंट इतना अलग है कि National Geographic ने इसे अलग महासागर मान लिया है.



हमारी धरती का 75 परसेंट भाग पानी में डूबा हुआ है. सात महाद्वीपों के साथ चार महासागर जीवन का आधार हैं. हालांकि, नैशनल जियोग्राफिक के अनुसार महासागर चार नहीं बल्कि पांच हैं. इसके अनुसार अंटार्कटिका के पास दक्षिणी महासागर भी अपने आप में एक अलग महासागर है और उसे आर्कटिक, अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागर के साथ स्थान मिलनी चाहिए. नैशनल जियोग्राफिक सोसायटी जियोग्राफर अलेक्स टेट के अनुसार वैज्ञानिक तो अंटार्कटिक दक्षिणी महासागर को अलग मानते रहे हैं लेकिन कभी अंतर्राष्ट्रीय सहमति नहीं बन पाई जबकि दुनिया का यह भाग बहुत खास है. (UK Ministry of Defence/REUTERS)



अब तक कहां छिपा था?

नैशनल जियोग्राफिक के अनुसार यह महासागर अंटार्कटिका के तट से 60 डिग्री दक्षिण की ओर है और दूसरे राष्ट्रों से किसी महाद्वीप नहीं बल्कि अपने करंट की वजह से अलग होता है. इसके अंदर आने वाले क्षेत्र अमेरिका से दोगुना है. सोसायटी आमतौर पर इंटरनैशनल हाइड्रोग्राफिक ऑर्गनाइजेशन के नामों को मानती है जिसने 1937 की गाइडलाइन्स में दक्षिणी महासागर को अलग माना था लेकिन 1953 में इसे बाहर कर दिया. इसके बावजूद अमेरिका के जियोग्राफिक नेम्स बोर्ड ने 1999 से दक्षिणी महासागर नाम का इस्तेमाल किया है. फरवरी में National Oceanic and Atmospheric Administration ने इसे मान लिया. (फोटो: British Antarctic Survey Reuters)



खतरों से घिरा

यह कदम कई अर्थ में खास है. नैशनल जियोग्राफिक एक्सप्लोरर एनरिक साला ने बताया है कि दक्षिणी महासगर में बहुत अनोखे और गम्भीर जलीय ईकोसिस्टम पाए जाते हैं जहां वेल, पेंग्विन्स और सील्स जैसे जीव रहते हैं. ऐसी हजारों प्रजातियां हैं जो केवल यहीं रहती हैं, और कहीं नहीं पाई जातीं. इस क्षेत्र में मछली पकड़ने की गतिविधियों का बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा है. ऐसे में संरक्षण की आवश्यकता के चलते भी इसे अलग से मान्यता देना अहम हो जाता है. इसके अतिरिक्त जलवायु बदलाव का प्रभाव भी पड़ रहा है. पिछले महीने दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड अंटार्कटिका से अलग हो गया. फरवरी में भी एक विशाल हिमखंड टूट गया था. (Reuters)



कब बना था?

एक खास अंटार्कटिक सर्कमपोलर करंट भारी मात्रा में पानी ट्रांसपोर्ट करता है और पूरे विश्व में ऐसे सर्कुलेशन सिस्टम को चलाता है जो धरती पर गर्मी ट्रांसपोर्ट करता है. नैशनल जियोग्राफिक 1915 से मैप तैयार कर रहा है और इसके करंट के आधार पर कार्टोग्राफर्स ने यह निर्णय किया है. वर्ल्ड वाइड फंड के अनुसार यह महासागर सबसे हाल में बना महासागर हुआ. यह 3 करोड़ वर्ष पहले बना था जब अंटार्कटिका और दक्षिण अमेरिका एक-दूसर से अलग हुए थे. टेट का बोलना है कि इस महासागर के बारे में लोगों को अलग से बताया-पढ़ाया नहीं गया तो इसकी जरूरतों, सम्मान और खतरों को समझा नहीं जा सकेगा.