धरती से पहुंचे ऐस्ट्रोनॉट्स तो गले लगकर स्वागत ट्विटर पर लोगों ने पूछा, ISS पर Covid-19 का डर नहीं?

धरती से पहुंचे ऐस्ट्रोनॉट्स तो गले लगकर स्वागत ट्विटर पर लोगों ने पूछा, ISS पर Covid-19 का डर नहीं?

Elon Musk की कंपनी SpaceX ने अपने Crew Dragon स्पेसक्राफ्ट में 4 ऐस्ट्रोनॉट्स को अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) के लिए लॉन्च किया. ये सभी ऐस्ट्रोनॉट जब ISS पहुंचे तो वहां पहले से उपस्थित 7 ऐस्ट्रोनॉट्स ने हाथ मिलाकर और गले लगकर उनका स्वागत किया. जब इस मुलाकात की फोटोज़ और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया तो लोगों के मन में प्रश्न उठना लाजमी था. जब धरती पर लोगों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग अनिवर्य हो गई है, क्या स्पेस में इसकी आवश्यकता नहीं?


ये सभी ऐस्ट्रोनॉट जब ISS पहुंचे तो वहां पहले से उपस्थित 7 ऐस्ट्रोनॉट्स ने हाथ मिलाकर और गले लगकर उनका स्वागत किया. जब इस मुलाकात की फोटोज़ और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया तो लोगों के मन में प्रश्न उठना लाजमी था.


Elon Musk की कंपनी SpaceX ने अपने Crew Dragon स्पेसक्राफ्ट में 4 ऐस्ट्रोनॉट्स को अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) के लिए लॉन्च किया. ये सभी ऐस्ट्रोनॉट जब ISS पहुंचे तो वहां पहले से उपस्थित 7 ऐस्ट्रोनॉट्स ने हाथ मिलाकर और गले लगकर उनका स्वागत किया. जब इस मुलाकात की फोटोज़ और वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया तो लोगों के मन में प्रश्न उठना लाजमी था. जब धरती पर लोगों के लिए सोशल डिस्टेंसिंग अनिवर्य हो गई है, क्या स्पेस में इसकी आवश्यकता नहीं?

​​ISS पर कोविड-19 नहीं?

अगले चार दिन तक सभी 11 ऐस्ट्रोनॉट ISS पर रहेंगे जो एक समय में 13 अंतरिक्ष यात्रियों के रिकॉर्ड के करीब है. इस समय छह अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री, दो रूसी, दो जापानी और एक फ्रांसीसी अंतरिक्ष यात्री ISS में उपस्थित है. यहां से बुधवार को तीन अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और एक जापानी अंतरिक्ष यात्री लौटेगा. आखिर इस दौरान यह कैसे सुनिश्चित किया गया कि धरती पर हाहाकार मचाने वाला कोविड-19 वायरस ISS को संक्रमित ना करे? लोगों ने सोशल मीडिया पर ऐसे कई प्रश्न किए.

​तो क्या करते हैं ऐस्ट्रोनॉट​?

दरअसल, स्पेस में जाने से पहले ऐस्ट्रोनॉट्स को दो से तीन हफ्तों के लिए क्वारंटीन किया जाता है. कोविड-19 वायरस की महामारी धरती पर फैलने के पहले से यह नियम चला आ रहा है. अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के अपोलो कार्यक्रम के दौरान ऐस्ट्रोनॉट्स स्पेस में बीमार पड़े थे और उनकी दवाइयां समाप्त होने लगी थीं. यह दुर्लभ केस था लेकिन इसके बाद दो सप्ताह का क्वारंटीन जरूरी कर दिया गया. इस दौरान नजदीकी परिजनों से सीमित मुलाकात की जा सकती थी.

अब ऐस्ट्रोनॉट्स अपनी फ्लाइट्स से पहले दो सप्ताह क्वारंटीन में बिताते हैं. ये क्वॉर्टर नासा के केनेडी और जॉनसन स्पेस सेंटर और Roscosmos के दक्षिणी कजाकिस्तान के बायकोनूर कॉस्मोड्रोम में स्थित हैं. इन लोगों से मिलने की इजाजत खास लोगों को होती है जो मेडिकली टेस्टेड होते हैं. कोविड-19 वायरस की महामारी के बाद ज्यादातर कार्य घर से हो रहा है.

​ताकि अंतरिक्ष से ना ले आएं संक्रमण​​

यही नहीं, अंतरिक्ष के मिशन से लौटने वाली टीमें भी क्वारंटीन होती हैं. ऐसा इसलिए ताकि बाहरी दुनिया से कोई संक्रमण धरती पर ना आ जाए. नासा ने अपने अपोलो 11, 12, 13 और 14 मिशन की चांद से वापसी के बाद मोबाइल क्वारंटीन फसिलटी में क्वारंटीन कराया. चांद से लाए गए सैंपल्स को भी क्वारंटीन करके लूनर रिसीविंग लैबरेटरी (LRL) में रखा गया. यहां तक कि चांद पर सबसे पहले कदम रखने वाले नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने अपना जन्मदिन भी इसी क्वारंटीन में मनाया था.


धरती पर हैं चार नहीं, पांच महासागर? अंटार्कटिका के पास है कुछ सबसे अनोखा

धरती पर हैं चार नहीं, पांच महासागर? अंटार्कटिका के पास है कुछ सबसे अनोखा

हमारी धरती का 75 परसेंट भाग पानी में डूबा हुआ है. सात महाद्वीपों के साथ चार महासागर जीवन का आधार हैं. हालांकि, नैशनल जियोग्राफिक के अनुसार महासागर चार नहीं बल्कि पांच हैं. इसके अनुसार अंटार्कटिका के पास दक्षिणी महासागर भी अपने आप में एक अलग महासागर है और उसे आर्कटिक, अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागर के साथ स्थान मिलनी चाहिए. नैशनल जियोग्राफिक सोसायटी जियोग्राफर अलेक्स टेट के अनुसार वैज्ञानिक तो अंटार्कटिक दक्षिणी महासागर को अलग मानते रहे हैं लेकिन कभी अंतर्राष्ट्रीय सहमति नहीं बन पाई जबकि दुनिया का यह भाग बहुत खास है. (UK Ministry of Defence/REUTERS)

Southern Ocean of Antarctica: अंटार्कटिका के पास पानी का करंट इतना अलग है कि National Geographic ने इसे अलग महासागर मान लिया है.



हमारी धरती का 75 परसेंट भाग पानी में डूबा हुआ है. सात महाद्वीपों के साथ चार महासागर जीवन का आधार हैं. हालांकि, नैशनल जियोग्राफिक के अनुसार महासागर चार नहीं बल्कि पांच हैं. इसके अनुसार अंटार्कटिका के पास दक्षिणी महासागर भी अपने आप में एक अलग महासागर है और उसे आर्कटिक, अटलांटिक, हिंद और प्रशांत महासागर के साथ स्थान मिलनी चाहिए. नैशनल जियोग्राफिक सोसायटी जियोग्राफर अलेक्स टेट के अनुसार वैज्ञानिक तो अंटार्कटिक दक्षिणी महासागर को अलग मानते रहे हैं लेकिन कभी अंतर्राष्ट्रीय सहमति नहीं बन पाई जबकि दुनिया का यह भाग बहुत खास है. (UK Ministry of Defence/REUTERS)



अब तक कहां छिपा था?

नैशनल जियोग्राफिक के अनुसार यह महासागर अंटार्कटिका के तट से 60 डिग्री दक्षिण की ओर है और दूसरे राष्ट्रों से किसी महाद्वीप नहीं बल्कि अपने करंट की वजह से अलग होता है. इसके अंदर आने वाले क्षेत्र अमेरिका से दोगुना है. सोसायटी आमतौर पर इंटरनैशनल हाइड्रोग्राफिक ऑर्गनाइजेशन के नामों को मानती है जिसने 1937 की गाइडलाइन्स में दक्षिणी महासागर को अलग माना था लेकिन 1953 में इसे बाहर कर दिया. इसके बावजूद अमेरिका के जियोग्राफिक नेम्स बोर्ड ने 1999 से दक्षिणी महासागर नाम का इस्तेमाल किया है. फरवरी में National Oceanic and Atmospheric Administration ने इसे मान लिया. (फोटो: British Antarctic Survey Reuters)



खतरों से घिरा

यह कदम कई अर्थ में खास है. नैशनल जियोग्राफिक एक्सप्लोरर एनरिक साला ने बताया है कि दक्षिणी महासगर में बहुत अनोखे और गम्भीर जलीय ईकोसिस्टम पाए जाते हैं जहां वेल, पेंग्विन्स और सील्स जैसे जीव रहते हैं. ऐसी हजारों प्रजातियां हैं जो केवल यहीं रहती हैं, और कहीं नहीं पाई जातीं. इस क्षेत्र में मछली पकड़ने की गतिविधियों का बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा है. ऐसे में संरक्षण की आवश्यकता के चलते भी इसे अलग से मान्यता देना अहम हो जाता है. इसके अतिरिक्त जलवायु बदलाव का प्रभाव भी पड़ रहा है. पिछले महीने दुनिया का सबसे बड़ा हिमखंड अंटार्कटिका से अलग हो गया. फरवरी में भी एक विशाल हिमखंड टूट गया था. (Reuters)



कब बना था?

एक खास अंटार्कटिक सर्कमपोलर करंट भारी मात्रा में पानी ट्रांसपोर्ट करता है और पूरे विश्व में ऐसे सर्कुलेशन सिस्टम को चलाता है जो धरती पर गर्मी ट्रांसपोर्ट करता है. नैशनल जियोग्राफिक 1915 से मैप तैयार कर रहा है और इसके करंट के आधार पर कार्टोग्राफर्स ने यह निर्णय किया है. वर्ल्ड वाइड फंड के अनुसार यह महासागर सबसे हाल में बना महासागर हुआ. यह 3 करोड़ वर्ष पहले बना था जब अंटार्कटिका और दक्षिण अमेरिका एक-दूसर से अलग हुए थे. टेट का बोलना है कि इस महासागर के बारे में लोगों को अलग से बताया-पढ़ाया नहीं गया तो इसकी जरूरतों, सम्मान और खतरों को समझा नहीं जा सकेगा.