गरम दल के क्रांतिकारी का आज है 155वीं जयंती, पढ़े इनकी बहादुरी के किस्से

गरम दल के क्रांतिकारी का आज है 155वीं जयंती, पढ़े इनकी बहादुरी के किस्से

गरम दल के क्रांतिकारी नेता लाला लाजपत राय (Lala Lajpat Rai) की बहादुरी के किस्से कई किताबों में दर्ज हैं. ‘शेरे पंजाब’ व ‘पंजाब केसरी’ के नाम से प्रसिद्ध लाजपत राय प्रसिद्ध सेनानी तिकड़ी ‘लाल-बाल-पाल’ का भाग थे. राष्ट्रवाद की उनकी विचारधारा ने ही उन्हें यह पहचान दिलाई. ‘स्वदेशी’ आंदोलन की वकालत करने वाली यह तिकड़ी अंग्रेजों के विरूद्ध अपने गरम मिजाज के लिए प्रसिद्ध थी. खास बात यह है कि पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की स्थापना की पहल भी लाजपतराय ने ही की थी. 28 जनवरी 2020 को देश उन्हें उनकी 155वीं जयंती पर याद कर रहा है.

लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी 1865 के दिन पंजाब के धुदिके में एक जैन परिवार में हुआ था. स्वामी दयानंद सरस्वती के सुधारवादी आंदोलन से प्रभावित होकर वे आर्य समाज लाहौर के मेम्बर बने व लाहौर के आर्य गजट के संपादक बने. 1886 में वे हिसार बार काउंसिल के मेम्बर बने. उसी वर्ष कांग्रेस पार्टी की हिसार ब्रांच की स्थापना भी की. उन्होंने कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना भी की. लाल-बाल-पाल की जोड़ी ने ही पूर्ण स्वराज की मांग उठाई थी. 1917 में प्रथम दुनिया युद्ध के दौरान वे अमेरिका चले गए थे, जहां से 1920 में लौटे. 1921 से 1923 तक वे कारागार में रहे.

लाठीचार्ज में लहूलुहान लाल ने यूं तोड़ा था दमः साइमन कमीशन के विरोध में सड़क पर उतरे लाला उनके समर्थकों पर अंग्रेजों ने जमकर अत्याचार किया था. ब्रिटिश पुलिस के लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हो गए थे. बुरी तरह घायल होने के बावजूद उन्होंने वहां एकत्रित भीड़ को संबोधित किया. उन्होंने कहा, ‘मैं घोषित करता हूं कि आज मुझ पर जो हमला किया गया, वह हिंदुस्तान में ब्रिटिश शासन के ताबूत की आखिरी कील साबित होगा.’ इसके बाद उपचार के दौरान हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया था.

भगत सिंह ने लिया था मृत्यु का बदलाः अंग्रेजों से लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला शहीदे आजम भगत सिंह व राजगुरु ने लिया था. दोनों ने 17 फरवरी 1928 के दिन सेमी ऑटोमैटिक पिस्टल से गोली मार कर ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की मर्डर कर दी थी. सॉन्डर्स के मरने के बाद भी भगतसिंह का ताबड़तोड़ हमला जारी रहा. इस मुद्दे में भगत सिंह को उनके साथियों राजगुरु व सुखदेव के साथ फांसी दे दी गई थी.