राजस्थान : अब जल्द ही खुद इंसानों का निवाला बन सकती है टिड्डियां

राजस्थान : अब जल्द ही खुद इंसानों का निवाला बन सकती है टिड्डियां

राजस्थान समेत देश के कई राज्यों के लिए टिड्डियां (locusts) एक बड़ी कठिनाई बन गई हैं। यह उड़ता आतंक फसलों को चट (Crops Ruined) कर रहा है व किसानों के साथ सरकार की भी नींद उड़ा दी है।

जल्द ही टिड्डियों के इस आतंक (Teroor Of Locusts) को मौका में बदलने की तैयारी की जा रही है। फसलों को चट कर रही टिड्डियां अब जल्द ही खुद इंसानों का निवाला बन सकती है। ऑल इंडिया नेटवर्क प्रोजेक्ट के तहत कीट विज्ञान पर विभिन्न तरह के अध्ययन व शोध हो रहे हैं। अब इस प्रोजेक्ट के तहत टिड्डियों की न्यूट्रिशनल वैल्यू यानि पोषक तत्वों की उपलब्धता ज्ञात करने के लिए अध्ययन किया जाएगा।

प्रोटीन का अच्छा स्रोत हैं टिड्डियां

प्रोजेक्ट के नेटवर्क कॉर्डिनेटर डाक्टर अर्जुन सिंह बालोदा के मुताबिक हिंदुस्तान मे अभी तक टिड्डियों के पोषण सम्बन्धी महत्त्व या न्यूट्रिशनल वैल्यू को लेकर कोई अध्ययन उपलब्ध नहीं है। हालांकि विदेश में इस पर कुछ रिसर्च हुए हैं जिनमें इसे पोषण की दृष्टि से जरूरी व प्रोटीन का अच्छा स्रोत माना गया है। अब हिंदुस्तान में ही इस पर स्टडी होगी जिसके तहत टिड्डियो को सुखाकर पावडर बनाने के बाद उनकी न्यूट्रिशनल वैल्यू निकाली जाएगी। 28 वर्ष बाद टिड्डियों का प्रकोप

स्टडी में अच्छी न्यूट्रिशनल वैल्यू सामने आने पर मांसाहारी लोगों के लिए यह बेहतर विकल्प साबित होने कि सम्भावना है। देश में चूंकि करीब 28 वर्ष बाद टिड्डियों का प्रकोप हुआ है। लिहाजा अब तक इन पर ज्यादा शोध नहीं हो सका है लेकिन अब 2 वर्ष से लगातार टिड्डियां हिंदुस्तान में आ रहीं हैं इसलिए इन पर रिसर्च की तैयारी है। डाक्टर बालोदा के मुताबिक अभी देश के कई हिस्सों में दूसरी तरह के टिड्डे खाए जाते हैं जिनकी रिसर्च में अच्छी पोषक वैल्यू भी सामने आई है। डेजर्ट लॉकस्ट भी इनकी ही तरह उपयोगी साबित हो सकती है। संसार में टिड्डियों की कई प्रकार की प्रजातियां पाई जाती हैं व इनमें से कुछ को कई राष्ट्रों में खाया भी जाता है। यदि हिंदुस्तान में भी इस दृष्टि से विचार किया जाए तो विकल्प पैदा हो सकते हैं। अब देश में ही इन पर प्रामाणिक अध्ययन उपलब्ध होगा व तबाही मचा रही टिड्डियों को भोजन के एक पौष्टिक विकल्प बनाया जा सकेगा।

कीटनाशकों पर भी शोध

ऑल इंडिया नेटवर्क प्रोजेक्ट के तहत टिड्डीयों को मारने के लिए नए मॉलिक्यूल्स पर रिसर्च की भी तैयारी है। अभी नए रिसर्च उपस्थित नहीं होने से पुराने कीटनाशक ही उपयोग में लिए जा रहे हैं जिनसे टिड्डियां भी कम संख्या में मर रहीं हैं व जमीन को भी ज्यादा नुकसान हो रहा है। नेटवर्क कॉर्डिनेटर डॉ अर्जुन सिंह बालोदा के मुताबिक नए मॉलिक्यूल टिड्डी नियंत्रण में कितने प्रभावी साबित हो सकते हैं, जल्द ही इस पर रिसर्च प्रारम्भ किया जाएगा। रिसर्च के लिए लगातार टिड्डियों का मिलना महत्वपूर्ण है जो अब उपलब्ध हो रही हैं। नए मॉलीक्यूल्स से कम कीटनाशक में ज्यादा टिड्डियों को मारा जा सकता है व नुकसान को घटाया जा सकता है।