पीएम नरेन्द्र मोदी इस नेता से लेते थे पॉलिटिक्स सिखने की सलाह

पीएम नरेन्द्र मोदी  इस नेता से लेते थे पॉलिटिक्स सिखने की सलाह

महाराष्ट्र की सियासी बिसात पर हारी बाजी को जीतकर सिकंदर बनकर उभरे फायर बिग्रेड नेता शरद पवार ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बुद्धि के मुकाबले अनुभव को कम करके नहीं आंका जा सकता. इतिहास में उन्हें न केवल अपने किले को सुरक्षित रखने बल्कि बीजेपी व शिवसेना की 30 वर्ष पुरानी दोस्ती में सेंध लगाने के लिए भी याद किया जाएगा. पीएम नरेन्द्र मोदी ने एक बार पवार की सराहना करते हुए बोला था कि वह पॉलिटिक्स के गुर सीखने के लिए राकांपा नेता से सलाह लेते थे. 

सियासी पंडितों को यह बात अब शीशे की तरह स्पष्ट हो गयी कि मोदी क्यों पवार के राजनीतक कौशल के प्रशंसक हैं. बीजेपी द्वारा शिवसेना को सीएम पद नहीं देने के बाद कांग्रेस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बाला साहब ठाकरे की विरासत संभाल रही पार्टी के साथ जाने को एकबारगी तैयार नहीं था. किंतु पवार ने एक सधे हुए राजनीतिज्ञ की तरह इसके लिए कांग्रेस पार्टी नेतृत्व को मनाया व शिवसेना के साथ हाथ मिलाने को तैयार कर लिया.

हालांकि भतीजे अजित पवार के रातों रात पाला बदलकर देवेन्द्र फडणवीस की सरकार में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से एक बार लगा था कि महाराष्ट्र की पॉलिटिक्स का शेर शरद पवार अब चूक चुका है. लेकिन अगले ही दांव में पवार ने न केवल बीजेपी बल्कि सारे सियासी विश्लेषकों को चारों खाने चित्त कर दिया.

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने अपने प्रचार बल के जरिये यह साबित करने का कोशिश किया था कि वह प्रदेश में प्रचंड बहुमत से वापसी कर रही है. यहां तक कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने फडणवीस को चुनाव प्रचार के दौरान प्रदेश का अगला सीएम घोषित कर दिया. किंतु प्रचार की इस चकाचौंध से प्रभावित हुए बिना 78 वर्षीय पवार ने गांव गांव व लगभग हर निर्वाचन क्षेत्र में जाकर अपना प्रचार अभियान जारी रखा.

विधानसभा चुनाव के दौरान सतारा की एक चुनावी जनसभा में पवार की एक तस्वीर राष्ट्रीय सुर्खी बनी थी जिसमें बरसते पानी में उन्होंने अपना सम्बोधन जारी रखा था. उसी जनसभा में पवार ने बोला था कि यह बारिश ''ईश्वर की कृपा है. सतारा विधानसभा सीट से इस बार राकांपा के श्रीनिवास पाटिल ने बीजेपी प्रत्याशी व शिवाजी महाराज के वंशज उदयन राजे भोंसले को हराया था."

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-रांकापा गठबंधन का चेहरा ही पवार थे. इस बात को बीजेपी अच्छी तरह जानती थी व इसी लिए चुनाव प्रचार के दौरान मोदी, शाह सहित अधिकांश नेताओं के प्रहारों के निशाने पर पवार ही थे. किंतु पवार ने अपने कुशल प्रचार अभियान व अपने पार्टी के ठीक उम्मीदवार चुनकर प्रदेश की 54 सीटों पर राकांपा को सफलता दिलवाई.

पवार महाराष्ट्र की पॉलिटिक्स में जरूरी किरदार निभाने वाले शक्कर सहकारी संघों में भी गहरी पैठ रखते हैं. वह महज 27 साल की आयु में बारामती से विधायक बने व केवल दस वर्ष बाद 38 साल की आयु में महाराष्ट्र के सबसे युवा सीएम बन गये थे. वह कुल तीन बार महाराष्ट्र के सीएम बने हैं.

पवार के पहली बार सीएम बनने का घटनाक्रम किसी रोचक कथा से कम नहीं हैं. आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस पार्टी महाराष्ट्र में कई सीटों पर पराजय गयी. इसके बाद राज्‍य के मुख्‍यमंत्री शंकर राव चव्‍हाण ने पराजय की नैतिक जिम्‍मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया. वसंतदादा पाटिल उनकी स्थान महाराष्‍ट्र के सीएम बने. बाद में कांग्रेस पार्टी में टूट हो गई व पार्टी कांग्रेस पार्टी (यू) तथा कांग्रेस पार्टी (आई) में बंट गई. पवार के गुरु यशवंत राव व पवार कांग्रेस पार्टी (यू) में शामिल हो गए. 1978 में महाराष्‍ट्र में विधानसभा चुनाव हुआ व कांग्रेस पार्टी के दोनों धड़ों ने भिन्न-भिन्न चुनाव लड़ा. बाद में जनता पार्टी को सत्‍ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस पार्टी के दोनों धड़ों ने एक साथ मिलकर सरकार बनाई. वसंतदादा पाटिल सीएम बने रहे. इस सरकार में शरद पवार उद्योग व श्रम मंत्री बने.

बताया जाता है कि जुलाई 1978 में शरद पवार ने अपने गुरु के इशारे पर कांग्रेस पार्टी (यू) से खुद को अलग कर लिया व जनता पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाई. बाद में यशवंत राव पाटिल भी शरद पवार की पार्टी में शामिल हो गए. इंदिरा गांधी के दोबारा सत्‍ता में आने के बाद फरवरी 1980 में पवार के नेतृत्‍व वाली प्रगतिशील लोकतांत्रिक मोर्चे की सरकार गिर गई.

1999 में उनके राजनीतक ज़िंदगी ने एक बड़ी करवट ली. सोनिया गांधी के विदेशी मूल का होने के कारण उन्हें कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष बनाये जाने का विरोध करने पर उन्हें कांग्रेस पार्टी से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस का गठन करना पड़ा. किंतु पवार की पॉलिटिक्स में गहरी पैठ के कारण कांग्रेस पार्टी को लगातार तीन बार महाराष्ट्र में उनकी पार्टी से गठबंधन कर सरकार बनाना पड़ा.

अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के हटने के बाद जब 2004 में संप्रग की सरकार बनी तो पवार को कृषि मंत्री बनाया गया. हालांकि इससे पहले भी वह 1990 के दशक में रक्षा मंत्रालय का प्रभार संभाल चुके थे. बाद में 2009 में भी वह केंद्र में कृषि मंत्री बने. पवार ने 2012 में घोषणा की थी कि वह अब लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे. किंतु चुनाव लड़ने का अर्थ सक्रिय पॉलिटिक्स से संन्यास लेना नहीं होता है. पवार ने महाराष्ट्र घटनाक्रम में दिखा दिया कि उनकी प्रदेश की पॉलिटिक्स पर अब भी वही पकड़ है जो आज से चार दशक पहले हुआ करती थी.