माली हालत के हैं ये आंकड़े चिंताजनक, पढ़े पूरी खबर

 माली हालत के हैं ये आंकड़े चिंताजनक, पढ़े पूरी खबर

पिछली छह तिमाहियों से देश की माली हालत चिंता में डाले हुए है. इस वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर ने गिरते-गिरते पिछली छब्बीस तिमाहियों का रेकार्ड तोड़ दिया. वृद्धि दर अब सिर्फ साढ़े चार फीसद बची है. यानी इस वर्ष की पहली छमाही का आंकड़ा पौने पांच फीसद बैठ रहा है. हाल वैसे देश की माली हालत के सुधरने के संभावना भी नहीं दिख रहे. इसीलिए देश की जीडीपी का अनुमान लगाने वाली तमाम एजंसियां इस वर्ष पांच सवा पांच फीसद से ज्यादा का अंदाजा नहीं लगा रही हैं. बेशक ये आंकड़े चिंताजनक हैं.

वैसे वृद्धि दर में उतार-चढ़ाव कोई अपूर्व घटना नहीं है. स्थिति को सामान्य बताने वाले विशेषज्ञ इस हालत को चक्रीय घटना बताते हुए दिलासा दे रहे हैं. लेकिन आमतौर पर यह नहीं बताया जा पा रहा है कि इस दुश्चक्र से बचाव कैसे किया जाए? जो कुछ किया जा रहा है, वह नाकाफी साबित हुआ है. बेशक अर्थव्यवस्था में उतार-चढ़ाव आते जाते रहते हैं, लेकिन चिंता तब जरूर होती है जब वृद्धि दर में गिरावट लंबे समय तक बनी रहे. तब चिंता व भी बढ़ती है जब कोई उपाय, दशा को संभाल ना पा रहा हो. पिछले तीन-चार महीने से अर्थव्यवस्था को संभालने के भारी-भरकम सरकारी खर्च वाले तरीका किए गए. उद्योग जगत व बैंकों को बड़ी-बड़ी आर्थिक मदद दी गई. इसका तर्क यह कि औद्योगिक उत्पादन घटने की खबरें कई तिमाहियों से बढ़ रही थीं. इसलिए राहत पैकेज उसी क्षेत्र को दिए गए जिन्हें उत्पादन बढ़ाने वाला माना जाता है. उद्योग जगत की मदद के लिए कॉरपोरेट कर में भारी कटौती की गई. सोचा व बोला गया कि कॉरपोरेट कर कम करने से उद्योग जगत के पास पैसा बचेगा व वह पैसा औद्योगिक गतिविधियां बढ़ाने में कार्य आएगा. रियल एस्टेट क्षेत्र को भी पैकेज दिया गया. इसका मकसद अधूरी पड़ी आवास परियोजनाएं पूरी करना है. मौद्रिक तरीका भी करके देख लिए गए. इसी तरह भिन्न-भिन्न क्षेत्रों को मदद देकर उद्योग क्षेत्र में फिर से जान फूंकने की प्रयास की गई. इसके बाद भी अगर बात उतनी बनती दिख नहीं रही है तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ठीक क्षेत्रों पर ध्यान लगाया गया?

गौरतलब है कि अर्थव्यवस्था को तीन क्षेत्रों की उत्पादक गतिविधियां तय करती हैं. ये तीन क्षेत्र हैं विनिर्माण, सेवा व कृषि. गौर करें तो पिछले तीन महीनों में विनिर्माण व सेवा क्षेत्र यानी कॉरपोरेट को ऊपर उठाने की कोशिशें ज्यादा हुर्इं. लेकिन पिछले तीन महीने के तरीकों में कृषि क्षेत्र पर उतना ध्यान नहीं गया. इसलिए इस पहलू की चर्चा होनी महत्वपूर्ण है. इस बात से कोई मना नहीं करता कि देश में इस समय समस्या कम औद्योगिक उत्पादन की है. इसका सीधा-सा मतलब है कि उत्पाद की मांग घटी है. अगर मांग होती व फिर भी उत्पादन कम हो रहा होता तो इस समय महंगाई पिछले सारे रेकॉर्ड तोड़ चुकी होती. अर्थशास्त्र के बड़े विशेषज्ञ चाहें तो निष्कर्ष निकाल कर बता सकते हैं कि इस समय देश में उत्पादन नहीं बल्कि उत्पाद की मांग घट रही है. हालांकि कुछ गैरसरकारी विशेषज्ञ बता भी रहे हैं कि समस्या उपभोक्ता के निर्बल पड़ जाने की है. इसे वे क्रय-शक्ति का कम होना कहते हैं. इस अवस्था को आर्थिक सुस्ती बोला जाता है व आम बोलचाल की भाषा में बोला जाने लगता है कि लोगों की जेब में पैसा नहीं है. मार्केट की भाषा में यह मार्केट में ग्राहकी का न होना है. अगर वर्तमान परिस्थिति को ग्राहक या उपभोक्ताओं की माली हालत के नजरिए से देखें तो आज की आर्थिक सुस्ती से निपटने के लिए उपभोक्ताओं को मजबूत करने के तरीका होने चाहिए. फिर सवाल यह उठेगा कि ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों यानी अधिक से अधिक उपभोक्ताओं को मजबूत कैसे किया जाए?

अपना देश एक सौ पैंतीस करोड़ आबादी का देश है. देश के औसत नागरिक पर सूई टिकाना चाहें तो वह निम्न मध्य आय वर्ग पर जाकर टिकेगी, यानी मध्यवर्ग से नीचे का वर्ग. इस वर्ग की रिहाइश का पता करने निकलें तो ऐसे सबसे ज्यादा उपभोक्ता गांव में रहते हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि देश की आधी से ज्यादा आबादी गांव में बसती है. इसीलिए औद्योगिक उत्पाद का एक बहुत बड़ा उपभोक्ता ग्रामीण हिंदुस्तान है. लगता है कि सरकारी अर्थशास्त्रियों का ध्यान अभी इन उपभोक्ताओं पर गया नहीं है.

ग्रामीण हिंदुस्तान से बहुत ज्यादा समय से इशारा मिल रहे थे कि वहां का उपभोक्ता आर्थिक रूप से निर्बल हो रहा है. ज्यादा दूर की नहीं, तीन महीने पहले की ही बात है. रिपोर्ट आई थी कि गांवों में रोजमर्रा की आवश्यकता की चीजों की खपत घट रही है. इस वजह से रोजमर्रा का सामान बनाने वाली कंपनियों के कारोबार में भी मंदी आ रही है. कारण यह कि एफएमसीजी क्षेत्र में बना माल शहरों में जितना खपता है, उससे डेढ़ गुना ज्यादा खपत गांवों में होती है. इसलिए साबुन, तेल, बिस्कुट, बाल्टी जैसे उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की बिक्री पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भारी प्रभाव पड़ा. इस तरह गांव, किसान या कृषि क्षेत्र की बदहाली सीधे-सीधे कॉरपोरेट से जुड़ी मानी जानी चाहिए. कॉरपोरेट को कर में छूट देकर उसे कितनी भी राहत पहुंचा ली जाए आखिर में बात वहीं जाकर अटकेगी कि कॉरपोरेट के माल बिकने की स्थितियां बेकार तो नहीं हो रहीं हैं. यानी कारपोरेट की स्वास्थ्य तब ज्यादा सुधरेगी जब ग्रामीणों की जेब में पैसा होगा.

बहुत से अर्थशास्त्री अच्छी तरह से समझते हैं कि किसान की जेब में पैसा होने का एक संकेतक कृषि विकास दर का बढ़ना है. लेकिन इन दिनों जब भी जीडीपी के नए आंकड़े आए, तब सबका ध्यान सिर्फ औद्योगिक विकास दर की कमी पर खींचा गया. आॅटोमोबाइल, टेक्सटाइल, सीमेंट, रियल एस्टेट आदि क्षेत्रों में गिरावट आई व उन्हीं पर चर्चा होती रही. लेकिन कृषि क्षेत्र पर किसी का ध्यान नहीं गया. कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर पिछले वर्ष की दूसरी तिमाही के 4.9 फीसद से घट कर इस वर्ष की दूसरी तिमाही में सिर्फ 2.1 फीसद रह गई. यह एक बहुत बड़ा सूचक है कि इस समय गरीबों व गांव वालों की जेब की क्या हालत है.

हमें भूलना नहीं चाहिए कि कभी हम कृषि को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहते थे. छह दशक पहले जीडीपी में कृषि का सहयोग 56.5 फीसद था. लेकिन जीडीपी में उद्योग क्षेत्र का सहयोग बढ़ता गया व कृषि का सहयोग घटता गया. हालांकि कृषि का सहयोग कम दिखने का कारण भी ढूंढ़ा जाना चाहिए. विश्लेषण यह होने कि सम्भावना है कि जीडीपी का आकलन तीनों क्षेत्रों के उत्पादित माल के दाम से बनता है व ये एक उजागर सच है कि कृषि उत्पाद का दाम उस हिसाब से नहीं बढ़ा जिस हिसाब से उद्योग के माल के दाम बढ़े. इस तथ्य पर भी गौर होना चाहिए कि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं की दौड़ में उद्योग क्षेत्र वृद्धि दर के लिए ज्यादा मुनाफे का था. इसलिए कृषि कि अनदेखी कभी देश में मुख्य चर्चा का विषय बनी भी नहीं. कृषि का सहयोग भले ही कम हो, लेकिन आबादी के लिहाज से वह देश का सबसे बड़ा व्यवसाय आज भी है. देश की आधी आबादी कृषि से रोजगार पाती है. पर अब कृषि क्षेत्र उसमें लगे व्यक्तियों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरा करने लायक मुनाफा भी नहीं दे पा रहा है. जाहिर है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बदहाली का प्रभाव देश के मार्केट पर पड़ने लगा है. ऐसे में देश की आबादी के सबसे बड़े हिस्से की जेब में पैसे पहुंचाए बिना थमे हुए बाजारों का चक्का दोबारा चलाना बड़ा कठिन होगा.