म्यांमार पर कूटनीतिक पशोपेश की स्थिति, बेहद संभल कर कदम बढ़ा रहा भारत, जानें

म्यांमार पर कूटनीतिक पशोपेश की स्थिति, बेहद संभल कर कदम बढ़ा रहा भारत, जानें

पड़ोसी देश म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलट के बाद जो स्थिति बनी है उसने भारत को बड़े कूटनीतिक पशोपेश में डाल दिया है। भारत तख्ता पलट के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों पर म्यांमार की सेना की हिंसक कार्रवाइयों का विरोध तो कर रहा है लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देशों की तरह प्रतिबंध लगाने से परहेज कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में म्यांमार की स्थिति पर बुधवार को चर्चा में भारत ने म्यांमार सेना की कार्रवाइयों की निंदा की है और तेजी से लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करने की मांग की है।

बिम्सटेक में मुद्दे को उठाने से किया परहेज

हालांकि गुरुवार को ही बिम्सटेक देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने म्यांमार के मुद्दे को उठाने से परहेज किया। इस बैठक में म्यांमार के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। यूएनएससी की बैठक में भारत के स्थाई प्रतिनिधि टी एस त्रिमूर्ति ने म्यांमार में जारी हिंसा की कड़े शब्दों में निंदा की और वहां हो रही मौतों पर शोक जताया।


भारत का रवैया नरम

साथ ही उन्होंने कैद किए गए राजनीतिक बंदियों को जल्द से जल्द छोड़ने और आम जनता की उम्मीदों को पूरा करने के लिए कदम उठाने की बात कही है। हालांकि भारत का यह रवैया यूएनएससी बैठक में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देशों के रूख से काफी नरम है। इन देशों की तरफ से म्यांमार सेना की तरफ से संचालित निगमों के खिलाफ और सख्त कार्रवाई करने की धमकी दी गई है।


ब्रिटेन ने लगाए प्रतिबंध

बैठक के बाद ब्रिटेन ने तो म्यांमार इकोनॉमिक कार्पोरेशन (एमईसी) के खिलाफ प्रतिबंध लगा भी दिए। एमईसी और म्यांमार इकोनॉमिक होल्डिंग्स लिमिटेड जैसी कंपनियों की बागडोर सेना के हाथ में है और ये देश विदेश में खनन से संबंधित कारोबार से जुड़ी हुई हैं। एक फरवरी, 2021 को तख्ता पलटने के बाद म्यांमार की सेना ने सभी सरकारी कंपनियों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है।


विशेष प्रतिनिधि ने गृह युद्ध की आशंका जताई

म्यांमार मामलों के यूएन की तरफ से नियुक्त विशेष प्रतिनिधि ने अपनी रिपोर्ट में म्यांमार की स्थिति बेहद चिंताजनक बताते हुए यूएन से ज्यादा निर्णायक कार्रवाई करने की बात कही है। उन्होंने यहां तक कहा है कि अगर बाहरी हस्तक्षेप नहीं किया गया तो म्यांमार में बड़ा गृह युद्ध होगा और यह एक असफल देशों में शामिल हो सकता है जिसका स्थानीय व वैश्विक दुष्प्रभाव होगा। अमेरिका का रवैया भी धीरे धीरे काफी सख्त होता दिख रहा है।

ब्रिटेन ने भी दिए कड़े संकेत

ब्रिटेन के विदेश मंत्री डोमिनिक राब ने भी संकेत दिया है कि वह म्यांमार के खिलाफ दूसरे कड़े विकल्पों पर विचार कर रहा है। इसके विपरीत गुरुवार को बिम्सटेक संगठन (भारत, बांग्लादेश, भूटान, थाईलैंड, नेपाल, श्रीलंका और म्यांमार) के विदेश मंत्रियों की बैठक में विदेश मंत्री एस जयशंकर के भाषण में म्यांमार की मौजूदा स्थिति का कोई जिक्र नहीं था। इसमें म्यांमार की सेना की तरफ से नियुक्त विदेश मंत्री ने हिस्सा लिया था।

कड़ी मशक्कत के बाद सुधरे थे संबंध

माना जा रहा है कि अपने बड़े रणनीतिक हितों को देखते हुए भारत ने म्यांमार को लेकर फूंक-फूंक कर कदम आगे बढ़ा रहा है। काफी मशक्कत के बाद भारत ने हाल के वर्षों में म्यांमार के साथ अपने रिश्तों को काफी सुधार लिया था। भारत को म्यांमार की जरूरत सिर्फ चीन के बढ़ते प्रभुत्व की वजह से ही नहीं है बल्कि पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय आतंकी संगठनों को काबू में करने के लिहाज से भी म्यांमार का सहयोग की दरकार होती है। इनमें से कई संगठनों के बारे में माना जाता है कि वो म्यांमार स्थित जंगल में छिपे हुए हैं। यही वजह है कि भारत वहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया का समर्थन कर रहा है लेकिन सैनिक शासन का अभी मुखर विरोध नहीं कर रहा। 


दिल्ली हाईकोर्ट ने दिए ये सख्त निर्देश, केजरीवाल सरकार को जोरदार फटकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिए ये सख्त निर्देश, केजरीवाल सरकार को जोरदार फटकार

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोरोना के कहर को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए केजरीवाल सरकार कोे जोरदार फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने कहा कि राजधानी के मौजूदा चिकित्सा ढांचे की सारी पोल खुल गई है। महामारी कोरोना के दौर में यह पूरी तरह से गर्त में है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार को कोरोना से पीड़ित सभी नागरिकों को जरूरत के अनुसार उपचार मुहैया कराने का सख्त निर्देश दिया है।

ऐसे में जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस रेखा पल्ली की पीठ ने कहा कि दिल्ली सरकार जब यह कहती है कि राज्य में चिकित्सा ढांचा ठीक है, तो वह उस शुतुरमुर्ग की तरह व्यवहार कर रही है, जो अपना सिर रेत में गड़ाए रहता है।

सरकार के पास हालात से निपटने का ढांचा नहीं
कोर्ट ने दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा से कहा कि जब आप मौजूदा हालात का बचाव करते हैं, तो इसका मतलब है कि आप राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। हम हमेशा साफ-साफ बात करते हैं।

आगे कोर्ट ने 53 वर्षीय मरीज को आईसीयू बेड दिलाने की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य का मौजूदा चिकित्सा ढांचा पूरी तरह बेनकाब हो गया है। यह अदालत याचिकाकर्ता की तरह लोगाें को महज यह कह कर नहीं लौटा सकती कि राज्य के पास इस हालत से निपटने का ढांचा नहीं है।

दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने कहा, मौजूदा ढांचे के साथ हम कोरोना से संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन कोर्ट यह नहीं कह कसता कि ढांचा गर्त में है। ऑक्सीजन की कमी है, तो ढांचा क्या करेगा। जीवन रक्षक गैस के अभाव में अस्पतालों ने अपने बेड कम कर दिए थे। सरकार ने कई कदम उठाए हैं।

लेकिन राहुल मेहरा की 15000 बेड और 1200 आईसीयू बेड पाइपलाइन में होने की दलील पर हाईकोर्ट एकदम से भड़क उठा। हाईकोर्ट ने कहा कि नहीं यह सही नहीं है। केवल ऑक्सीजन के कारण ऐसा नहीं है। यदि आपके पास ऑक्सीजन हो तो क्या उसके अलावा आपके पास सब कुछ है? पाइपलाइन पाइपलाइन है, अभी वो बेड वजूद में नहीं आए हैं।

आगे कोर्ट ने कहा कि लोगों की जान बचाने के लिए चिकित्सा ढांचा मुहैया कराना सरकार का दायित्व है, उससे इनकार नहीं किया जा सकता। हम इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ सकते कि शताब्दी में एक बार हम इस महामारी का सामना कर रहे हैं। आर्थिक रूप से काफी संपन्न देशों ने भी इतनी बड़ी आपदा में चिकित्सा ढांचे को लेकर अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। कोरोना मरीजों को अस्पताल की जरूरत है।


जबकि उच्च न्यायालय ने दिल्ली में चिकित्सा उपकरणों की कालाबाजारी को लेकर तल्ख टिप्पणी करते कहा कि लोगों का नैतिक तानाबाना बहुत हद तक 'विखंडित' हो गया है, क्योंकि वे कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए एक साथ आने की बजाय ऑक्सीजन सिलिंडर, दवाओं की जमाखोरी और कालाबाजारी में लिप्त हैं।

इस दौर में भी कालाबाजारी
साथ ही जस्टिस विपिन सांघी और न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने कहा हम अभी भी स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं, इसीलिए हम एक साथ नहीं आ रहे हैं। इसी कारण हम जमाखोरी और कालाबाजारी के मामले देख रहे हैं।

कोर्ट ने यह टिप्पणी एक वकील के उस सुझाव पर की, जिसमें उन्होंने सेवानिवृत्त चिकित्सा पेशेवरों, मेडिकल छात्रों या नर्सिंग छात्रों की सेवाएं मौजूदा स्थिति में लेने को कहा था।

इस पर उन्होंने कहा कि इस समय केवल दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और बिस्तरों की ही नहीं बल्कि चिकित्सा कर्मियों की भी कमी है। वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने सुझाव दिया कि स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जाए, जो सार्वजनिक-निजी भागीदारी की तरह हो, जिससे कोर्ट की सहायता की जा सके।


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