भारत, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के बीच होगी त्रिपक्षीय वार्ता, जानें रायसीना डायलॉग में किन मुद्दों पर होगी चर्चा

भारत, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के बीच होगी त्रिपक्षीय वार्ता, जानें रायसीना डायलॉग में किन मुद्दों पर होगी चर्चा

भारत, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के बीच 13 अप्रैल को त्रिपक्षीय वार्ता होगी। समाचार एजेंसी पीटीआइ ने अधिकारियों के हवाले से बताया कि भारत, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री 13 अप्रैल को त्रिपक्षीय वार्ता करेंगे। इस वार्ता में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि बैठक में कोरोना के असर से निपटने समेत अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा संभव है।

रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री मरीसे पायने (Marise Payne) और फ्रांस के विदेश मंत्री जीन वेस ली ड्रायन (Jean-Yves Le Drian) रायसीना डायलॉग में हिस्सा लेने के लिए 12 अप्रैल को भारत आएंगे। मालूम हो कि भारत और ऑस्ट्रेलिया क्वाड गठबंधन देशों का हिस्सा हैं। क्‍वाड गठबंधन देशों का मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र को पूरी दुनिया के लिए खुला रखना है। क्वाड के दो अन्य सदस्य देश जापान और अमेरिका हैं।


यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब चीन की आक्रामक रवैये दुनिया के तमाम मुल्‍क परेशान हैं। वहीं दूसरी ओर जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा 16 अप्रैल को वाशिंगटन दौरे पर जाएंगे। वह अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से व्यक्तिगत तौर पर मिलने वाले पहले विदेशी राजनेता होंगे। माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच वार्ता में चीन ही मुख्य मुद्दा होगा। अमेरिका के साथ जापान से भी चीन के संबंध बेहद तनावपूर्ण दौर में हैं।


दिल्ली हाईकोर्ट ने दिए ये सख्त निर्देश, केजरीवाल सरकार को जोरदार फटकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिए ये सख्त निर्देश, केजरीवाल सरकार को जोरदार फटकार

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोरोना के कहर को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए केजरीवाल सरकार कोे जोरदार फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने कहा कि राजधानी के मौजूदा चिकित्सा ढांचे की सारी पोल खुल गई है। महामारी कोरोना के दौर में यह पूरी तरह से गर्त में है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार को कोरोना से पीड़ित सभी नागरिकों को जरूरत के अनुसार उपचार मुहैया कराने का सख्त निर्देश दिया है।

ऐसे में जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस रेखा पल्ली की पीठ ने कहा कि दिल्ली सरकार जब यह कहती है कि राज्य में चिकित्सा ढांचा ठीक है, तो वह उस शुतुरमुर्ग की तरह व्यवहार कर रही है, जो अपना सिर रेत में गड़ाए रहता है।

सरकार के पास हालात से निपटने का ढांचा नहीं
कोर्ट ने दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा से कहा कि जब आप मौजूदा हालात का बचाव करते हैं, तो इसका मतलब है कि आप राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। हम हमेशा साफ-साफ बात करते हैं।

आगे कोर्ट ने 53 वर्षीय मरीज को आईसीयू बेड दिलाने की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य का मौजूदा चिकित्सा ढांचा पूरी तरह बेनकाब हो गया है। यह अदालत याचिकाकर्ता की तरह लोगाें को महज यह कह कर नहीं लौटा सकती कि राज्य के पास इस हालत से निपटने का ढांचा नहीं है।

दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने कहा, मौजूदा ढांचे के साथ हम कोरोना से संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन कोर्ट यह नहीं कह कसता कि ढांचा गर्त में है। ऑक्सीजन की कमी है, तो ढांचा क्या करेगा। जीवन रक्षक गैस के अभाव में अस्पतालों ने अपने बेड कम कर दिए थे। सरकार ने कई कदम उठाए हैं।

लेकिन राहुल मेहरा की 15000 बेड और 1200 आईसीयू बेड पाइपलाइन में होने की दलील पर हाईकोर्ट एकदम से भड़क उठा। हाईकोर्ट ने कहा कि नहीं यह सही नहीं है। केवल ऑक्सीजन के कारण ऐसा नहीं है। यदि आपके पास ऑक्सीजन हो तो क्या उसके अलावा आपके पास सब कुछ है? पाइपलाइन पाइपलाइन है, अभी वो बेड वजूद में नहीं आए हैं।

आगे कोर्ट ने कहा कि लोगों की जान बचाने के लिए चिकित्सा ढांचा मुहैया कराना सरकार का दायित्व है, उससे इनकार नहीं किया जा सकता। हम इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ सकते कि शताब्दी में एक बार हम इस महामारी का सामना कर रहे हैं। आर्थिक रूप से काफी संपन्न देशों ने भी इतनी बड़ी आपदा में चिकित्सा ढांचे को लेकर अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। कोरोना मरीजों को अस्पताल की जरूरत है।


जबकि उच्च न्यायालय ने दिल्ली में चिकित्सा उपकरणों की कालाबाजारी को लेकर तल्ख टिप्पणी करते कहा कि लोगों का नैतिक तानाबाना बहुत हद तक 'विखंडित' हो गया है, क्योंकि वे कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए एक साथ आने की बजाय ऑक्सीजन सिलिंडर, दवाओं की जमाखोरी और कालाबाजारी में लिप्त हैं।

इस दौर में भी कालाबाजारी
साथ ही जस्टिस विपिन सांघी और न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने कहा हम अभी भी स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं, इसीलिए हम एक साथ नहीं आ रहे हैं। इसी कारण हम जमाखोरी और कालाबाजारी के मामले देख रहे हैं।

कोर्ट ने यह टिप्पणी एक वकील के उस सुझाव पर की, जिसमें उन्होंने सेवानिवृत्त चिकित्सा पेशेवरों, मेडिकल छात्रों या नर्सिंग छात्रों की सेवाएं मौजूदा स्थिति में लेने को कहा था।

इस पर उन्होंने कहा कि इस समय केवल दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और बिस्तरों की ही नहीं बल्कि चिकित्सा कर्मियों की भी कमी है। वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने सुझाव दिया कि स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जाए, जो सार्वजनिक-निजी भागीदारी की तरह हो, जिससे कोर्ट की सहायता की जा सके।


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