दिल्ली हाई न्यायालय नागरिक संहिता की मांग करने वाली इस याचिका पर इस दिन करेगा सुनवाई

दिल्ली हाई न्यायालय नागरिक संहिता  की मांग करने वाली इस  याचिका पर इस दिन करेगा सुनवाई

दिल्ली हाई न्यायालय (Delhi High Court) बुधवार को देश भर में समान नागरिक संहिता (Common Civil Code) की मांग करने वाली एक याचिका पर सुनवाई करेगा। मामले में केन्द्र सरकार से जवाब मांगा गया है। समान नागरिक संहिता अथवा समान आचार संहिता का अर्थ एक

पंथनिरपेक्ष (Secular) कानून होता है जो सभी पंथ के लोगों के लिए समान रूप से लागू होता है। दूसरे शब्दों में, भिन्न-भिन्न पंथों के लिए भिन्न-भिन्न सिविल कानून न होना ही 'समान नागरिक संहिता' की मूल भावना है।  सुप्रीम न्यायालय ने सितंबर 2019 में एक मुद्दे की सुनवाई के दौरान बोला था कि 1956 में हिंदू लॉ बनने के 63 वर्ष बीत जाने के बाद भी सारे देश में समान नागरिक आचार संहिता लागू करने के कोशिश नहीं किए गए

क्या है समान नागरिक संहिता?
भारतीय संविधान के भाग 4 में नीति निदेशक तत्त्वों का वर्णन है। इसके तहत अनुच्छेद 44 के अनुसार हिंदुस्तान के समस्त नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता होनी चाहिए। इसका अर्थ यह है कि हिंदुस्तान के सभी धर्मों के नागरिकों के लिए एक समान धर्मनिरपेक्ष कानून बनाया जाना चाहिए।  संविधान के संस्थापकों ने प्रदेश के नीति निदेशक तत्त्वों के माध्यम से इसको लागू करने को बोला है। इसके भीतर पर्सनल कानून, संपत्ति संबंधी कानून व विवाह, तलाक तथा गोद लेने से संबंधित कानूनों में मतभिन्नता है। आपको जानकारी के लिए बता दें कि, हिंदुस्तान में पर्सनल कानून धर्म के आधार पर तय किए गए हैं। हिंदू, सिख, जैन व बौद्ध धर्मों पर हिंदू कोड लागू होता है, जबकि मुस्लिम तथा ईसाई धर्मों के अपने अलग पर्सनल कानून हैं। मुस्लिमों का कानून शरीअत पर आधारित है।

क्या है बहुचर्चित शाहबानो बेगम केस
'मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम केस', जो 'शाहबानो केस' के नाम से चर्चित है।  शाहबानो एक 62 वर्षीय मुस्लिम महिला थीं, जिनके 5 बच्चे थे। उन्हें 1978 में पति ने विवाह के 40 वर्ष बाद तलाक दे दिया था। अपनी व अपने बच्चों के जीवनयापन के लिए शाहबानो पति से गुजारा भत्ता लेने के लिए न्यायालय पहुंचीं।  सुप्रीम न्यायालय में यह मामला 1985 में पहुंचा।  धर्म, जाति या संप्रदाय आधारित भेदभाव के बिना लागू होने वाली क्राइम दंड संहिता की धारा 125 के तहत न्यायालय ने फैसला दिया था।

संसद को दिया था यह कानून बनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि शाहबानो को ज़िंदगी निर्वाह के लिए भत्ता दिया जाए। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई। वी।  चंद्रचूड़ ने बोला कि समान नागरिक संहिता से भारतीय कानून में व्याप्त असमानता दूर होगी जिससे राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में मदद मिलेगी।  उसी निर्णय के समय सुप्रीम कोर्ट ने संसद को समान नागरिक संहिता से संबंधित कानून बनाने का आदेश दिया था।

गोवा में लागू है समान नागरिक संहिता
देश की आजादी के बाद गोवा ने पुर्तगाली नागरिक संहिता को अपना लिया था, जिसके कारण गोवा के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू है। इस संहिता के तहत पति या पत्नी द्वारा अधिग्रहीत सभी परिसंपत्तियों में दोनों का संयुक्त रूप से स्वामित्व होता है। यहां तक कि माता-पिता भी अपने बच्चों को अपनी संपत्ति से बेदखल नहीं कर सकते, उन्हें अपनी संपत्ति का कम से कम आधा भाग अपने बच्चों को देना ही पड़ता है।  साथ ही वे मुस्लिम आदमी जिन्होंने गोवा में अपनी विवाह का पंजीकरण करवाया है उन्हें बहुविवाह की अनुमति नहीं है।