सूरत में जल रही दिन रात चिताएं, गर्मी से पिघलने लगीं शवदाह गृह की चिमनियां

सूरत में जल रही दिन रात चिताएं, गर्मी से पिघलने लगीं शवदाह गृह की चिमनियां

गुजरात में कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। इस महामारी से बुरी तरह प्रभावित राज्य के शहरों में सूरत भी शामिल है। यहां महामारी की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गैस शवदाह गृह में दिन रात शव जलाए जा रहे हैं। चिताओं की गर्मी से शवों को जलाने के लिए बनाए गए लोहे के चैंबर और चिमनियां पिघलने लगी हैं।

श्मशान में गैस आधारित चैंबर रात दिन काम कर रहे हैं

अधिकारियों ने बताया कि पिछले एक हफ्ते से कुरुक्षेत्र श्मशान और अश्विनी कुमार श्मशान में करीब 16 गैस आधारित चैंबर रात दिन काम कर रहे हैं। कोरोना से इतनी ज्यादा संख्या में लोगों की मौत हो रही है कि चैंबरों की मरम्मत करने का मौका ही नहीं मिल रहा है।

लगातार शवों के जलने से पिघलने लगीं चिमनियां

गैस आधारित चैंबर में लोहे के फ्रेम बने हैं, जिन पर शवों को रखकर जलाया जाता है। हर चैंबर में लोहे की एक चिमनी भी होती है। अधिकारियों ने बताया कि लगातार शवों को जलाए जाने से फ्रेम और चिमनियां अत्यधिक गरम हो जा रही हैं और इसकी वजह से वग पिघलने लगी हैं।

कुरुक्षेत्र श्मशान में रोजाना 100 शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा

कुरुक्षेत्र श्मशान का प्रबंधन करने वाले ट्रस्ट के प्रेसिडेंट कमलेश सैलर ने कहा कि कोरोना महामारी के चलते रोजाना औसतन 20 की जगह 100 शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। अकेले सूरत शहर में ही पिछले कुछ दिनों से कोरोना के चलते रोजाना 18-19 मौतें हो रही हैं।

कुरुक्षेत्र श्मशान में शवों को जलाने के लिए छह चैंबर

सैलर के मुताबिक कुरुक्षेत्र श्मशान में शवों को जलाने के लिए छह चैंबर हैं, जो दिनों रात चल रहे हैं और इसकी वजह से उनका तापमान 600 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जा रहा है। तापमान बढ़ने से चैंबर में लगे लोहे के फ्रेम और चिमनी पिघलने और टूटने लगी हैं।

अश्विनी कुमार श्मशान में भी ऐसी ही परेशानी सामने आई है। श्मशान के प्रबंधक प्रशांत कब्रवाला ने कहा कि यहां गैस के 10 चैंबर हैं। पहले जहां रोजाना 30 शव जलाए जाते थे अब इनकी संख्या 90-95 हो गई है। अत्यधिक तापमान को रोकने के लिए कई तरह के उपाय किए जा रहे हैं। लकड़ी की चिता की संख्या भी बढ़ाई जा रही है। अभी इस तरह की तीन चिताएं थी, जिनकी संख्या पांच किया जा रहा है।


दिल्ली हाईकोर्ट ने दिए ये सख्त निर्देश, केजरीवाल सरकार को जोरदार फटकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिए ये सख्त निर्देश, केजरीवाल सरकार को जोरदार फटकार

नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोरोना के कहर को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए केजरीवाल सरकार कोे जोरदार फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने कहा कि राजधानी के मौजूदा चिकित्सा ढांचे की सारी पोल खुल गई है। महामारी कोरोना के दौर में यह पूरी तरह से गर्त में है। कोर्ट ने दिल्ली सरकार को कोरोना से पीड़ित सभी नागरिकों को जरूरत के अनुसार उपचार मुहैया कराने का सख्त निर्देश दिया है।

ऐसे में जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस रेखा पल्ली की पीठ ने कहा कि दिल्ली सरकार जब यह कहती है कि राज्य में चिकित्सा ढांचा ठीक है, तो वह उस शुतुरमुर्ग की तरह व्यवहार कर रही है, जो अपना सिर रेत में गड़ाए रहता है।

सरकार के पास हालात से निपटने का ढांचा नहीं
कोर्ट ने दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा से कहा कि जब आप मौजूदा हालात का बचाव करते हैं, तो इसका मतलब है कि आप राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। हम हमेशा साफ-साफ बात करते हैं।

आगे कोर्ट ने 53 वर्षीय मरीज को आईसीयू बेड दिलाने की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि राज्य का मौजूदा चिकित्सा ढांचा पूरी तरह बेनकाब हो गया है। यह अदालत याचिकाकर्ता की तरह लोगाें को महज यह कह कर नहीं लौटा सकती कि राज्य के पास इस हालत से निपटने का ढांचा नहीं है।

दिल्ली सरकार के वकील राहुल मेहरा ने कहा, मौजूदा ढांचे के साथ हम कोरोना से संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन कोर्ट यह नहीं कह कसता कि ढांचा गर्त में है। ऑक्सीजन की कमी है, तो ढांचा क्या करेगा। जीवन रक्षक गैस के अभाव में अस्पतालों ने अपने बेड कम कर दिए थे। सरकार ने कई कदम उठाए हैं।

लेकिन राहुल मेहरा की 15000 बेड और 1200 आईसीयू बेड पाइपलाइन में होने की दलील पर हाईकोर्ट एकदम से भड़क उठा। हाईकोर्ट ने कहा कि नहीं यह सही नहीं है। केवल ऑक्सीजन के कारण ऐसा नहीं है। यदि आपके पास ऑक्सीजन हो तो क्या उसके अलावा आपके पास सब कुछ है? पाइपलाइन पाइपलाइन है, अभी वो बेड वजूद में नहीं आए हैं।

आगे कोर्ट ने कहा कि लोगों की जान बचाने के लिए चिकित्सा ढांचा मुहैया कराना सरकार का दायित्व है, उससे इनकार नहीं किया जा सकता। हम इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ सकते कि शताब्दी में एक बार हम इस महामारी का सामना कर रहे हैं। आर्थिक रूप से काफी संपन्न देशों ने भी इतनी बड़ी आपदा में चिकित्सा ढांचे को लेकर अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। कोरोना मरीजों को अस्पताल की जरूरत है।


जबकि उच्च न्यायालय ने दिल्ली में चिकित्सा उपकरणों की कालाबाजारी को लेकर तल्ख टिप्पणी करते कहा कि लोगों का नैतिक तानाबाना बहुत हद तक 'विखंडित' हो गया है, क्योंकि वे कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए एक साथ आने की बजाय ऑक्सीजन सिलिंडर, दवाओं की जमाखोरी और कालाबाजारी में लिप्त हैं।

इस दौर में भी कालाबाजारी
साथ ही जस्टिस विपिन सांघी और न्यायमूर्ति रेखा पल्ली ने कहा हम अभी भी स्थिति की गंभीरता को नहीं समझ रहे हैं, इसीलिए हम एक साथ नहीं आ रहे हैं। इसी कारण हम जमाखोरी और कालाबाजारी के मामले देख रहे हैं।

कोर्ट ने यह टिप्पणी एक वकील के उस सुझाव पर की, जिसमें उन्होंने सेवानिवृत्त चिकित्सा पेशेवरों, मेडिकल छात्रों या नर्सिंग छात्रों की सेवाएं मौजूदा स्थिति में लेने को कहा था।

इस पर उन्होंने कहा कि इस समय केवल दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और बिस्तरों की ही नहीं बल्कि चिकित्सा कर्मियों की भी कमी है। वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने सुझाव दिया कि स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जाए, जो सार्वजनिक-निजी भागीदारी की तरह हो, जिससे कोर्ट की सहायता की जा सके।


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